कोरबा। आकांक्षी जिला और अरबों रुपये के डीएमएफ (DMF) फंड वाले कोरबा के सुदूर वनांचल आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दावों और हकीकत के बीच का यह फासला एक बार फिर किसी की जिंदगी पर भारी पड़ गया। लेमरू थाना क्षेत्र में एक सड़क हादसे के बाद घायल ग्रामीण करीब 3 घंटे तक सड़क पर तड़पता रहा, लेकिन उसे न तो संजीवनी 108 एम्बुलेंस मिली और न ही डायल 112 की मदद। समय पर इलाज न मिलने के कारण आखिरकार उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। व्यवस्था की इस सुस्ती से आक्रोशित ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा, “हादसे में हर एक मिनट कीमती होता है, यहां तो मदद आने में 3 घंटे लग गए… इतने समय में तो दशगात्र (मृत्यु भोज) का कार्यक्रम संपन्न हो जाता है।”
सिर पर आई थी गंभीर चोट, बाइक पर ले जाना नहीं था मुमकिन
यह दर्दनाक घटना लेमरू थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम लामपहाड़ मार्ग की है। 8 जून की रात करीब 7 बजे ग्राम अखराडांड निवासी एक ग्रामीण बाइक से गुजरते समय हादसे का शिकार हो गया। सिर पर गंभीर चोट आने के कारण वह मौके पर ही बेहोश हो गया।
साढ़े सात बजे के आसपास जब स्थानीय ग्रामीणों को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने तुरंत मदद की कोशिशें शुरू कीं। घायल की हालत इतनी नाजुक थी कि उसे बाइक पर बिठाकर अस्पताल ले जाना मुमकिन नहीं था, उसे तत्काल ‘इमरजेंसी लाइफ सपोर्ट’ (Ambulance) की जरूरत थी।
‘ड्राइवर घर जा चुका है’– प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का गैर-जिम्मेदाराना जवाब
मदद के लिए जब एक ग्रामीण ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेमरू के प्रभारी बी.डी. नायक से संपर्क किया, तो स्वास्थ्य केंद्र की पोल खुल गई। उन्हें दोटूक जवाब मिला कि ‘108 एम्बुलेंस का ड्राइवर माइकल अपनी ड्यूटी खत्म कर घर जा चुका है।’
इसके बाद ग्रामीणों ने ‘डायल 112’ को सूचना दी। लेकिन आपातकालीन सेवा का दावा करने वाली 112 की टीम भी पूरे 3 घंटे की देरी से लामपहाड़ पहुंची। इस 180 मिनट के लंबे इंतजार के बीच घायल ग्रामीण की सांसें टूट चुकी थीं। जब तक पुलिस वाहन मौके पर पहुंचा, तब तक उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
वनांचल में ‘पार्ट टाइम’ एम्बुलेंस: रात होते ही भगवान भरोसे मरीज
स्थानीय ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही को उजागर करते हुए बताया कि लेमरू में 108 एम्बुलेंस सेवा केवल ‘दिन के भरोसे’ चल रही है।
एक ही ड्राइवर के भरोसे व्यवस्था: आपातकालीन सेवा होने के बावजूद यहां चौबीसों घंटे के लिए पर्याप्त ड्राइवरों और ईएमटी (Emergency Medical Technician) की तैनाती नहीं है।
रात में नो-सर्विस: दिन में ड्यूटी करने के बाद ड्राइवर रात को चला जाता है, जिसके कारण रात के वक्त पूरा इलाका भगवान भरोसे हो जाता है। ग्रामीणों की मांग है कि यहां 24 घंटे शिफ्ट के अनुसार ड्राइवरों की ड्यूटी लगाई जाए।
सुलगते सवाल: आखिर इस मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इस दिल दहला देने वाली घटना ने जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
जब हर घायल के लिए ‘गोल्डन ऑवर’ (शुरुआती एक घंटा) सबसे कीमती होता है, तो 3 घंटे की यह देरी क्या ‘प्रशासनिक हत्या’ नहीं है?
करोड़ों रुपये के डीएमएफ फंड का दावा करने वाले जिले के वनांचलों में रात के समय एम्बुलेंस क्यों उपलब्ध नहीं रहती?
आम जनता के वोटों से चुने जाने वाले नेता, ग्रामीण अंचलों की इस जानलेवा असुविधा को दूर करने के लिए सक्रिय क्यों नहीं होते?
फिलहाल, ग्रामीण की मौत के बाद लेमरू क्षेत्र में भारी आक्रोश है। अब देखना यह है कि क्या इस गंभीर लापरवाही के बाद स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन की नींद खुलती है या फिर व्यवस्था इसी ढर्रे पर चलती रहेगी।


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