CG Congress News:–एक व्हाट्सएप ग्रुप, कुछ स्क्रीनशॉट और कांग्रेस के भीतर का सच

CG Congress News:–राजनीति अक्सर बड़े मंचों पर दिखाई देती है, लेकिन कई बार उसकी असली तस्वीर मोबाइल स्क्रीन पर खुलती है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के भीतर कथित गुटबाजी की जो चर्चा इन दिनों हो रही है, उसकी शुरुआत भी किसी रैली या प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि एक व्हाट्सएप ग्रुप से हुई है। आरोप हैं कि विचारधारा के आधार पर कार्यकर्ताओं को हटाने की बातें हुईं और आपत्तिजनक टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

Raigarh/Ambikapur | रायगढ़/अंबिकापुर।
बताया जा रहा है कि “सरगुजा महाराज कांग्रेस व्हाट्सएप ग्रुप” में हाल के दिनों में ऐसी बातचीत हुई, जिसने पार्टी के भीतर वैचारिक खींचतान को उजागर कर दिया। सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के मुताबिक, ग्रुप में यह कहा गया कि यह मंच सरगुजा महाराज टी.एस. सिंहदेव से जुड़ा है, न कि भूपेश बघेल से। आरोप यह भी है कि भूपेश बघेल की विचारधारा से जुड़े सदस्यों से खुद ग्रुप छोड़ने को कहा गया, और ऐसा न करने पर उन्हें हटाने की बात कही गई।

यहीं से सवाल उठता है—क्या अब राजनीति में असहमति का जवाब संवाद नहीं, बल्कि ‘रिमूव’ का बटन हो गया है?

टी.एस. सिंहदेव बोले— यह ओछी राजनीति है

इस पूरे घटनाक्रम पर पूर्व उप मुख्यमंत्री और सरगुजा महाराज टी.एस. सिंहदेव की प्रतिक्रिया सामने आई है। से बातचीत में उन्होंने इस विवाद को “ओछी राजनीति” बताया।

सिंहदेव का कहना है कि किसी भी व्हाट्सएप ग्रुप में एडमिन की जिम्मेदारी होती है कि वह तय करे किसे जोड़ना है और किसे हटाना है। उन्होंने यह भी कहा कि वे विचारों के आदान-प्रदान के पक्षधर हैं और बहस का स्वागत करते हैं। साथ ही यह भी जोड़ा कि मतभेद अगर हों, तो वे विचारों के स्तर पर और मर्यादा के भीतर होने चाहिए। यदि कोई आपत्तिजनक टिप्पणी करता है, तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है।

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उन्होंने यह भी बताया कि इस पूरे मामले की जानकारी उन्हें एक दिन पहले ही मिली और तब उन्हें यह पता चला कि वे स्वयं उस ग्रुप के एडमिन हैं।

संचार विभाग का बयान— कोई गुटबाजी नहीं

मामले पर कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने गुटबाजी के आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर किसी तरह की अंदरूनी लड़ाई नहीं है।

उन्होंने कहा कि कुछ विघ्नसंतोषी लोग अपनी पहचान बनाने के लिए इस तरह की गतिविधियां करते हैं। उनके मुताबिक, यह कुछ छुटभैया तत्वों की हरकत है, जिसका कांग्रेस नेतृत्व या पार्टी की आधिकारिक सोच से कोई लेना-देना नहीं है। पार्टी पूरी तरह एकजुट है और इस तरह के मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर देखना सही नहीं है।

सवाल जो व्हाट्सएप से बाहर निकलता है

यह मामला सिर्फ एक व्हाट्सएप ग्रुप का नहीं है। यह उस राजनीति का संकेत है, जहां विचारधारा अब किताबों और बहसों में नहीं, बल्कि ग्रुप में रहने या निकाले जाने से तय होने लगी है।

सवाल यह है कि जब राजनीतिक दल असहमति से असहज हो जाएं, तो लोकतंत्र किस दिशा में जाता है?
और जब विचारों की जगह नोटिफिकेशन तय करने लगें कि कौन अपना है और कौन नहीं—तो यह सिर्फ डिजिटल विवाद नहीं रह जाता, यह राजनीतिक संस्कृति का सवाल बन जाता है।

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