20 साल, 4 सरकारें, एक पुल नहीं — अंजाड़ी नाला आज भी सरकारों के झूठे वादों में डूबा है

20 साल, 4 सरकारें, एक पुल नहीं — अंजाड़ी नाला आज भी सरकारों के झूठे वादों में डूबा है

पखांजूर/कांकेर (मनकू नेताम की विशेष रिपोर्ट)।

छत्तीसगढ़ में दो बार कांग्रेस की सरकार आई। दो बार भाजपा को भी जनादेश मिला। नारे बदले, चेहरे बदले, गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ से लेकर सबका साथ, सबका विकास तक सबकुछ सुनने को मिला। लेकिन पखांजूर ब्लॉक के अंजाड़ी गांव में एक पक्का पुल नहीं बन पाया।

हर बार जब सवाल उठता है, तो सरकारें नक्सलवाद की आड़ लेती हैं — जैसे अंजाड़ी नाला कोई युद्ध क्षेत्र हो! लेकिन सच ये है कि इस नाले को हर रोज़ पार कर दस गांवों के ग्रामीण पखांजूर मुख्यालय आते हैं — राशन, इलाज, स्कूल, ज़रूरत की हर चीज़ के लिए। अगर ग्रामीण रोज़ पार कर सकते हैं तो पुल क्यों नहीं बन सकता?

देसी पुल, बाढ़, बहाव — ग्रामीणों की साल-दर-साल की बेबसी
हर साल ग्रामीण बांस-बल्ली से देशी पुल बनाते हैं, जिसे पहली बारिश में ही नाला बहा ले जाता है। फिर से श्रमदान कर बनता है, फिर बहता है। लेकिन इस साल ग्रामीणों ने थक-हारकर देसी पुल भी नहीं बनाया। ये हिम्मत नहीं टूटी, उम्मीद टूटी है।

सरकारी चिट्ठियाँ और आवेदन सिर्फ फाइलों में दफ्न
ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन को आवेदन दिए, सरपंचों से लेकर जिला कार्यालय तक गुहार लगाई — लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला। चुनावों में पुलिया सबसे बड़ा मुद्दा बनता है, और परिणाम आते ही सबसे पहले भुला दिया जाता है।

नक्सलवाद का नाम लेकर हर बार बचती रही सरकारें
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने शासन में रहते इस क्षेत्र को “नक्सल प्रभावित” कह कर पल्ला झाड़ा। लेकिन सवाल ये है — क्या 20 साल में सुरक्षा बलों की मौजूदगी, विकास योजनाएं, पंचायतें, स्कूल सब कुछ चल सकते हैं तो एक पुल क्यों नहीं? या फिर अंजाड़ी की जनता वोट देने के लिए सुरक्षित है लेकिन विकास पाने के लिए असुरक्षित?

नाला पार नहीं कर पाते मरीज, बच्चे और शिक्षक

  सक्रिय नक्सली नंगा ने सुरक्षा बलों के सामने किया आत्मसमर्पण

बारिश में गर्भवती महिलाओं और बीमारों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सकता
हाई स्कूल के छात्र स्कूल नहीं जा पाते, और शिक्षक नाला पार नहीं कर सकते
राशन दुकान तक पहुँचना मुश्किल
रोज़ की ज़रूरत की चीज़ों के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है

अब सिर्फ आश्वासन नहीं, एक्शन चाहिए
सरकार को अब तय करना होगा — क्या वो सचमुच ग्रामीण विकास चाहती है या सिर्फ नारों में विकास की दुकान चलाना चाहती है।
अगर सरकार ने फिर अनदेखी की, तो अंजाड़ी ही नहीं, पूरा क्षेत्र जवाब देगा — वोट से, विरोध से, और आवाज़ से।

यह खबर जनता के लिए है — ताकि यह देश जान सके कि छत्तीसगढ़ के कुछ गाँव अब भी नाला पार कर लोकतंत्र में विश्वास कर रहे हैं, लेकिन सरकार अब भी “नक्सल प्रभावित” का लेबल चिपका कर अपनी नाकामी छिपा रही है।

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